भास्कर एक्सक्लूसिव: ममता कुलकर्णी महामंडलेश्वर नियुक्ति पर संतों की कड़ी प्रतिक्रिया

Jan 25, 2025 - 14:16
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भास्कर एक्सक्लूसिव: ममता कुलकर्णी महामंडलेश्वर नियुक्ति पर संतों की कड़ी प्रतिक्रिया

भास्कर एक्सक्लूसिव: ममता कुलकर्णी महामंडलेश्वर नियुक्ति पर संतों की कड़ी प्रतिक्रिया

ममता कुलकर्णी को महामंडलेश्वर बनाए जाने की खबर ने सनातन धर्म और संत समाज में हलचल मचा दी है। कई संतों और धर्माचार्यों ने इसे सनातन परंपरा के साथ धोखा और छल करार दिया है। उनका कहना है कि किसी को भी उठाकर महामंडलेश्वर नहीं बनाया जा सकता। इसके लिए चरित्रवान और धर्म के प्रति समर्पित होना अत्यंत आवश्यक है।

महामंडलेश्वर की परंपरा और भूमिका

महामंडलेश्वर का पद सनातन धर्म में अत्यंत प्रतिष्ठित और जिम्मेदारी भरा होता है। यह पद केवल उन्हीं को दिया जाता है जो अपने जीवन में धर्म, साधना और संयम का पालन करते हैं। महामंडलेश्वर बनने के लिए गहरी आध्यात्मिक साधना, योग्यता और अनुशासन अनिवार्य हैं।

संतों की नाराजगी

संत समाज ने ममता कुलकर्णी को महामंडलेश्वर बनाए जाने पर गहरी नाराजगी जाहिर की है। एक प्रमुख संत ने कहा, "महामंडलेश्वर बनना केवल किसी औपचारिकता का हिस्सा नहीं है, बल्कि इसके लिए चरित्र, साधना और तपस्या की आवश्यकता होती है।" उन्होंने आगे कहा कि यह फैसला सनातन धर्म की परंपराओं का मजाक उड़ाने जैसा है।

धार्मिक परंपराओं के साथ छल?

संतों का यह भी कहना है कि किसी को केवल प्रसिद्धि या प्रभाव के आधार पर यह पद देना धर्म के साथ विश्वासघात है। इस तरह की नियुक्तियों से धर्म की पवित्रता और परंपराओं पर प्रश्नचिह्न लगते हैं।

ममता कुलकर्णी का पक्ष

इस विवाद पर ममता कुलकर्णी ने कहा कि उन्होंने वर्षों तक आध्यात्मिक जीवन जिया है और सनातन धर्म की सेवा में समर्पित रही हैं। हालांकि, संत समाज उनकी इस दलील को मानने को तैयार नहीं है। उनका कहना है कि अगर ऐसा है तो ममता को पहले अपने कार्यों और साधना से यह सिद्ध करना चाहिए।

धर्म की पवित्रता बनाए रखने की अपील

संत समाज ने इस मामले पर गहराई से विचार करने की अपील की है। उन्होंने कहा, "सनातन धर्म में इस तरह की लापरवाही और दिखावे की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। हमें अपने धर्म और परंपराओं को बचाए रखना होगा।"

निष्कर्ष

ममता कुलकर्णी को महामंडलेश्वर बनाए जाने का मामला न केवल विवाद का विषय बना है, बल्कि इससे सनातन धर्म की पवित्रता और परंपराओं पर भी सवाल उठने लगे हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस मामले में संत समाज और धर्माचार्य आगे क्या कदम उठाते हैं।

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